शुक्रवार 30 जनवरी 2026 - 09:30
हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम और दर्स ए बसीरत

हौज़ा / शहज़ादा-ए-बसीरत, शहीद-ए-कर्बला, जवान-ए-फ़िक्र, वारिस-ए-यक़ीन, आईना-ए-रसूल स.ल.व. मोअज़्ज़िन-ए-सुबह-ए-आशूर हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम कर्बला में केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि एक सवाल थे। और इतिहास गवाह है कि कुछ सवाल तलवारों से ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं।

लेखकः मौलाना सैयद अली हाशिम आब्दी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! शहज़ादा-ए-बसीरत, शहीद-ए-कर्बला, जवान-ए-फ़िक्र, वारिस-ए-यक़ीन, आईना-ए-रसूल स.ल.व. मोअज़्ज़िन-ए-सुबह-ए-आशूर हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम कर्बला में केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि एक सवाल थे। और इतिहास गवाह है कि कुछ सवाल तलवारों से ज़्यादा ख़तरनाक होते हैं।

कर्बला में बहुत कुछ हो रहा था: प्यास, घेराबंदी, कमी, भय और मौत की यक़ीनी ख़बर।लेकिन इन दुखों के हुजूम में एक नौजवान खड़ा होकर पूछता है:क्या हम हक़ पर नहीं हैं?

यह सवाल केवल इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से नहीं था, यह सवाल हर दौर के इंसान से था।और जब जवाब आया — “हाँ” — तो उस नौजवान ने वह जुमला कहा जिसने बसीरत की परिभाषा हमेशा के लिए लिख दी:फिर हमें मौत की कोई परवाह नहीं।यह जुमला जज़्बात नहीं, नतीजा है; यह नारा नहीं, मंतिक़ (तर्क) है; यह ख़ुदकुशी नहीं, शहादत है। यही फ़र्क़ बसीरत पैदा करती है।

दुनिया ने हमेशा कसरत (बहुसंख्यक) को हक़ का मेयार बनाया, लेकिन हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम ने हमें बताया कि हक़ को कसरत (बहुसंख्यक) की ज़रूरत नहीं होती।

बसीरत वह ताक़त है जो इंसान को भीड़ में भी अकेला, और तन्हाई में भी साबित क़दम रखती है! हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम ने हमें दिखाया कि राह-ए-हक़ पर चलने वाले बहुत कम होते हैं, लेकिन यह भी दिखाया कि हक़ कम होकर भी हक़ ही रहता है।

बसीरत आँखों की तेज़ी नहीं, ज़मीर की बेदारी है। वह ज़मीर जो शोर में भी सच सुन लेता है और फ़ायदे में भी नुक़सान को पहचान लेता है।

हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम की जवानी कोई आम जवानी नहीं थी, बल्कि फ़िक्र का मैदान थी! आपने हमें सिखाया: सवाल करो — बग़ावत नहीं, समझो — ख़ुदसरी नहीं, मानो — अंधी तक़लीद न करो,आपने यह सबक़ दिया कि अगर सवाल बसीरत के साथ हो,तो वह इताअत को मज़बूत करता है, कमज़ोर नहीं।

आज की दुनिया नौजवान को या तो ख़ामोश चाहती है या बेलगाम। हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम ने तीसरा रास्ता दिखाया: बाशऊर इताअत जहाँ इंसान अपनी अक़्ल भी रखता है और अपने वक्त के इमाम से जुड़ा भी रहता है।

कर्बला में हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम का हर क़दम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की इजाज़त से उठता है। यह इताअत किसी कमज़ोर की नहीं, बल्कि दिशा पहचानने वाले की है। जो जानता हो कि सूरज कहाँ है, वह साये के पीछे नहीं भागता।

आज जब इताअत को अपमान और बग़ावत को बहादुरी कहा जाता है, हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम हमें याद दिलाते हैं कि बसीरत क़ियादत से काटती नहीं, बल्कि जोड़ती है।

ध्यान रहे कि जब हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम की आवाज़, अज़ान बनकर फ़िज़ा में गूंजी, तो वह केवल नमाज़ का वक़्त नहीं बता रही थी, बल्कि बातिल के महलों में लरज़ा पैदा कर रही थी। यह एलान था कि ताक़त के शोर में भी हक़ की सदा दबती नहीं।

यह अज़ान हमें बताती है कि अगर इबादत शऊर के साथ हो तो वह इंक़लाबी अमल बन जाती है। और अगर सज्दा समझ के साथ हो तो वह तख़्तों को चुनौती देता है।आज का इंसान जानकारी से भरा है, लेकिन यक़ीन से ख़ाली;आवाज़ों से घिरा है, लेकिन सच से दूर; हमदर्दी में तेज़ है,लेकिन ज़िम्मेदारी में कमज़ोर। हर तरफ़ बयानिए हैं लेकिन मेयार नहीं।

हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम ने बताया कि: हर दुख़ मज़लूमियत नहीं, हर ग़ुस्सा शुजाअत नहीं और हर ख़ामोशी हिकमत नहीं! बल्कि हक़ को पहचानने के लिए इल्म, तक़वा और मरकज़-ए-हक़ से वाबस्तगी
लाज़िमी है।

हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम की शहादत हमें यह नहीं सिखाती कि हर दौर में ख़ून बहाना फ़र्ज़ है, बल्कि यह सिखाती है कि हर दौर में अपनी अहंकार, अपनी सहूलत,अपनी मक़बूलियत को क़ुर्बान करना ज़रूरी है। आज का मैदान, मैदान-ए-किरदार है, और आज की शहादत, सच पर क़ायम रहना है।

हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम शहीद होकर ख़त्म नहीं हुए, वह दर्स बन गए! एक ऐसा दर्स जो हर दौर के नौजवान से सवाल करता है: क्या तुमने हक़ को पहचान लिया है? अगर हाँ  तो फिर डर की कोई गुंजाइश नहीं।

सलाम हो उस जवान पर जिसने सवाल को हथियार बनाया,
सलाम हो उस बसीरत पर जिसने कर्बला को केवल इतिहास नहीं ज़िंदगी बना दिया।

टैग्स

आपकी टिप्पणी

You are replying to: .
captcha